नवरात्र के सातवें दिन देवी मां को कालरात्रि  के रूप में पूजा जाता है।

मां दुर्गा की यह सातवीं शक्ति कालरात्रि के नाम से जानी जाती है अर्थात जिनके शरीर का रंग घने अंधकार की तरह एकदम काला है। माता कालरात्रि को शुभंकरी, महायोगीश्वरी और महायोगिनी भी कहा जाता है। सिर के बाल बिखरे हुए हैं और गले में विद्युत की तरह चमकने वाली माला है। अंधकारमय स्थितियों का विनाश करने वाली शक्ति हैं कालरात्रि। पुराणों में बताया गया है कि मां कालरात्रि की पूजा व उपवास करने से सभी नकारात्मक शक्तियों का नाश होता है और आरोग्य की प्राप्ति होती है।

रात को पूजा करते समय ‘ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नमः’ मंत्र का सवा लाख बार जप करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। देवी कालरात्रि का पिंगला नाड़ी पर अधिकार माना जाता है। यह देवी तमाम सिद्धियों को प्रदान करने वाली हैं। इनकी साधना से भविष्य में देखने की क्षमता का विकास होता है। भक्त की साधना मूलाधार से सहस्त्रधार चक्र तक पहुंच जाती हैं | सहस्त्रधार चक्र सर की छोटी की जगह होता हैं | मन से भय का नाश होता है। देवी कालरात्रि अपने भक्तों को भोग और मोक्ष प्रदान करती हैं। कालरात्रि माता भगवान विष्णु की योगनिद्रा भी कही जाती है।

दुर्गासप्तशती के प्रथम चरित्र में बताया गया है कि भगवान विष्णु जब योगनिद्रा में थे तो कान के मैल से दो भयंकर राक्षस मधु और कैटभ उत्पन्न हुए। ये दोनों राक्षस ब्रह्मा जी को मारना चाहते थे। ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु की योगनिद्रा की आराधना की। ब्रह्मा जी ने भगवान विष्णु की योगनिद्रा को कालरात्रि के रूप में ध्यान किया। ब्रह्मा जी की वंदना से मां कालरात्रि ने भगवान विष्णु को योगनिद्रा से जगाया। भगवान विष्णु ने मधु-कैटभ का वध करके ब्रह्मा जी की रक्षा की।

देवी कालरात्रि ने युद्ध में चंड मुंड के बालों को पकड़ कर खड्ग से उसके सिर को धड़ से अलग कर दिया। चंड मुड का वध करने के कारण, भक्तगण चामुंडा देवी के नाम से भी पुकारेंगे इसलिए मां कालरात्रि को चामुंडा देवी भी कहते हैं।

मां दुर्गा ने रक्तबीज का अंत कर दिया तो उसके रक्त की हर बूँद से एक और रक्तबीज उत्पन्न हो गया। इस तरह लाखो रक्त बीक उत्पन्न हो गए | यह देखकर माँ को अत्यधिक  क्रोध आ गया । क्रोध से मां का वर्ण श्यामल हो गया। इसी श्यामल रूप से देवी कालरात्रि का प्राकट्य हुआ। इसके बाद मां कालरात्रि ने रक्तबीज समेत सभी दैत्यों का वध कर दिया और शरीर से निकलने वाले रक्त को जमीन पर गिरने से पहले अपने मुख में भर लिया। इस तरह सभी असुरों का अंत हुआ। इस वजह से माता को शुभंकरी भी कहा गया।

कालरात्रि माता को क्या चढ़ाया जाता है?

मां कालरात्रि को गुड़हल के फूल चढ़ाएं जाते हैं और गुड़ का भोग लगाया जाता है, इसके बाद कपूर, दीपक से माता की आरती करी  जाती हैं|  हो तो 108 गुड़हल के फूलों की माला बनाकर माता को अर्पित करे|

मंत्र

1 ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चै नमः

2  या देवी सर्वभू‍तेषु माँ कालरात्रि रूपेण संस्थिता।
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

मां कालरात्रि स्तोत्र


हीं कालरात्रि श्रीं कराली च क्लीं कल्याणी कलावती।
कालमाता कलिदर्पध्नी कमदीश कुपान्विता॥

कामबीजजपान्दा कमबीजस्वरूपिणी।
कुमतिघ्नी कुलीनर्तिनाशिनी कुल कामिनी॥

क्लीं ह्रीं श्रीं मन्त्र्वर्णेन कालकण्टकघातिनी।
कृपामयी कृपाधारा कृपापारा कृपागमा॥

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